जानिये- अपना मन वास्तव में है क्या? what is mind?






मन क्या है ? what is mind? 




दोस्तों मन को इतने आसान शब्दों में परिभाषित नहीं कर सकते है ,  चलिए चलते है  मन की गहराई में , तभी पता लगेगा .
की आखिर जो हमारा मन है , यह वास्तव में है क्या? दोस्तों आज हम इसी विषय की जानकारी से आपको अवगत कराएंगे! दोस्तों आप  जरूर पढ़े और सबके साथ शेयर करे!  





मन ये बङा साधारण सा लगने वाला प्रश्न लगता अवश्य है पर है नहीं . आप विचार करे कि मन शब्द का प्रयोग पूरे विश्व में होता है .लेकिन ये कोई नहीं जानता कि मन आखिर है कहाँ किसको मन कहा जाता है .हमारे शरीर में उसकी क्या और कहाँ स्थिति है . तो लोग अक्सर सिर की तरफ़ इशारा करते हैं और कोई कोई दिमाग या दिल को मन बताते हैं यह दोंनों ही बात गलत हैं और ये एक आश्चर्यजनक सत्य है.






वर्तमान मेडीकल सांइस में जितनी खोज हो चुकी है उसके आधार पर कोई भी अभी भी नहीं बता सकता कि मन आखिर है क्या और हैं कहाँ .हांलाकि इस तरह की बात कहना उचित नहीं है फ़िर भी आगामी सौ साल बाद , हजार साल बाद भी ये प्रश्न का उत्तर ज्यों का त्यों ही रहेगा .




आज मान लीजिये कि नासा के प्रोजेक्ट देख कर संसार हैरत में है और नासा का सबसे बङा मिशन है . ऐसे किसी दूसरे ग्रह की तलाश जिस पर किसी भी प्रकार का जीवन हो या फ़िर हमारी तरह की मनुष्य सभ्यता वहाँ निवास करती हो . इस पर अरबों डालर का खर्च आता है .अब जरा आप बहुत लोकप्रिय पुस्तक तुलसी की रामायण का उत्तरकाण्ड खोलकर देंखे तो नासा की तमाम खोज तमाम प्रयास आपको बचकाने लगेगें . इसमें तुलसी ने काकभुसुन्डी के माध्यम से अनेको स्रष्टियों का वर्णन किया है . 








वास्तव में मन है पर वहाँ कहीं नहीं जहाँ हम समझते हैं . बुधि भी मन का ही दूसरा रूप है. बुधि मन का ही परिशोधित रूप है. मन जब कोई फैसला करता है तो उसे बुधि कहते हैं. चित भी मन का ही तीसरा रूप है. मन जब कल्पना करता है तो उसे चित कहते हैं. मन जब कोई कियृा करता है तो उसे अंहकार कहते हैं. तो इस जगत में या कहीं भी सारा खेल ही मन का है. लेकिन वास्तव में वो कया है जिसे मन कहते हैं! 




 बहुत से लोग इस गलतफ़हमी के शिकार हैं कि इस सृष्टि को ब्रह्मा ने बनाया है । आईये इसको भी जानते हैं । सात दीप । नव खन्ड के । इस राज्य का मालिक । निरंजन यानी ररंकार यानी राम यानी कृष्ण यानी काल पुरुष यानी मन है । यह सृष्टि निर्माण के बाद अपने आरीजनल रूप को गुप्त करके हमेशा के लिये अदृष्य हो गया । वास्तव में इसकी पत्नी और इसके तीन बच्चे ब्रह्मा विष्णु शंकर भी इसको अपनी इच्छा से नहीं देख सकते हैं । यह अपनी इच्छा से ही किसी को मिलता है । आपको याद होगा । राम अवतार के समय शंकर ने कहा था । हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम से प्रकट होत मैं जाना ।

तब भी इसकी सिर्फ़ आवाज ही आकाशवाणी के द्वारा सुनाई दी थी । वास्तव में यही राम कृष्ण के रूप में अवतार लेता है । और वेद आदि धर्म ग्रन्थ इसी की प्रेरणा से रचे गये हैं । वेदों को तो इसने स्वंय रचा है । सारे धर्म ग्रन्थों में यही संदेश देता है । इसकी पत्नी अष्टांगी कन्या यानी आध्या शक्ति यानी सीता यानी राधा यानी ब्रह्मा विष्णु शंकर की माँ यानी प्रकृति यानी सृष्टि की पहली औरत है ।



वेदांत के नजरीये से कहा जाय तो मन नाम की कोई वस्तु ही नही है, वह मात्र एक आभास है। जब शरीर-बुद्धि-अहंकार सयुक्त होते है तब एक उर्जा का निर्माण होता है वह उर्चाका नाम चित्तशक्ति कहलाता है। यह शक्ति का पर्यायवाचि शब्द ही मन के नाम से संसार में जाना जाता है। हालाकि मन और आत्मा दो अलग अलग नही है, जबकी वह अलग अलग दिखते जरुर है। जब आत्मा निष्किर्य, निर्लिप्त अवस्था में रहता है तब उसे आत्मा कहते है और जब वह सक्रिय रहता है तब उसे मन कहा जाता है। जब आत्मा शरीर-बुद्धि-अहंकार को स्विकार करता है उससे आश्कत रहता है तब वह मन कहलाता है अन्यथा वह सिर्फ निराकार, निगुण आत्मा ही होता है। 




शरीर, बुद्धि, संसार यह सब चित्तशक्ति का हि परिणाम है जो आत्मा की नीजकी शक्ति कहलाती है। आश्कति के कारण ही आत्मा अपनी शक्ति का उपयोग करके यह सब सृष्टि रचता है और एक समय ऐसा आता है जब वह आशक्ति रहीत हो कर सर्वव्यापक परमात्मा में लिन हो जाता है। 








परमात्मा और आत्मा एक ही है पर विभिन्न आश्क्तिओं के कारण मन-चित्त बहुतरे दिखते है और वह अपना अपना संसार निर्माण कर मनोनाश होने तक उसमें आत्मा को खिचकर बाधित करते रहते है। यह सिर्फ मेरी समज है हालाकि ज्ञानिलोग उसमें कुच प्रकाश डाल सकते है जो सब के लिए लाभदाई हो सकता है।

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