यूं ही वक्त कट जाता पता ही नहीं चलता!






वो स्याम का समय , चारों दिशाओं में प्यार का अहसास दिलाती वो हवाएं और एक प्यारा सा गार्डन जहाँ कभी कभी ऐसे ही बैठे रहना अच्छा लगता है , साथ में बैठे रहना और  कुछ मै कहुं , कुछ तुम कहो अपनी बाते! 







यूं ही वक्त कट जाता पता ही नहीं चलता!




उसी वक्त में , कभी-कभी तुम्हारी बाते सुनना अच्छा लगता , और कभी कभी अच्छा लगता है बस तुमको देखता रहूं! फिर उसी वक्त में तुम अपनी झुकी हुई नज़रे उठा कर देखती हो! उसी वक्त मेरी उठी हुई नज़रे झुक जाती है! 








यूँ ही वक्त कट जाता पता ही नहीं चलता! 




बस ऐसे ही वक्त कट जाता और इस वक्त में दो दिलो का मिलना अच्छा लगता है! फिर ऐसे ही वक्त की शरुआत होती और मिलना अच्छा लगता है , तुम मेरे दोस्त हो फिर दिल करता अच्छे दोस्त बन जाओ! 








यूँ ही वक्त कट जाता पता ही नहीं चलता! 




तुम जो बताती हो , वो सुनते रहने का मन करता है! फिर तुम से कुछ कहने का मन करता है! वक्त से थोड़ा और थोड़ा बढ़ जाने की गुजारिश करने का मन करता है! लेकिन वक्त तो वक्त है ठहरा जितना है उतना ही कल फिर आएगा! 








यूँ ही वक्त कट जाता पता ही नहीं चलता! 




एहसास भी कुछ अलग होता है! जो हर वक्त बात करने में , हो ही जाता है , फिर चाहे वो दुख हो या सुख! ख़ुशी में अलग एहसास और गम में अलग एहसास हो जाता! 


यूँ ही वक्त कट जाता पता ही नहीं चलता! 

सुन कर मेरी बात कभी तुम हंसती हो तो , कभी में हँसता हूँ , और बातों ही बातों में तुम नजाने कहाँ खो जाती हो पता ही नहीं चलता! यूँ दो दिलों का मिलना तो चलता ही रहेगा साहेब , लेकिन प्यार का इजहार करना अभी बाकी है!   





यूँ ही वक्त कट जाता पता ही नहीं चलता!

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