जानिए "दोस्ती की असली पहचान'' क्या है




दोस्ती एक ऐसा 'शब्द' जो 'शब्द' नहीं है , अपितु यह एक एहसास है , फीलिंग है! हमारे हाव-भाव से ओतप्रोत दोस्ती का दूसरा नाम ही ज़िंदगी है!


हमें पता है दोस्ती की शुरुआत हमारे जीवन में जन्म के बाद तब होती है जब हम कुछ जानने और पहचानने लग जाते या सोचने और समझने लग जाते है!


लेकिन क्या आपको पता है? सही मायने में हमारी दोस्ती की पहली शुरुआत प्रत्यक्ष रूप से कब होती है?





नहीं पता है न? तो दोस्तों आज के इस छोटे से लेख में  आपको 'दोस्ती की पहचान' से अवगत कराऊंगा जो हमारी सबसे पहली दोस्ती होती है!


हमारी दोस्ती की शुरुआत सबसे पहले माँ से होती है , पिता से होती है भाई-बहन , दादा-दादी और भी हमारे परिवार के कई लोगों से हमारी दोस्ती की शुरुआत होती है और जो हमें दोस्ती के साथ प्यार भी करते है और नि:स्वार्थ भाव से निभाते भी है!


यह बात तो सही है , हमारा बचपन केसा रहा होगा हमें पता नहीं होता है लेकिन हमारे दोस्तों (परिवार के सदस्य) को सब कुछ पता होता है वो कभी भूलते नहीं है क्यूंकि यही दोस्त हमारी परवरिश करते है हमें प्यार से रखते है! हमारा पालन पोषण करते है!






यदि आपका मन नहीं माने तोह एक बार अपने परिवार में या माता-पिता से जरूर पूछे और कहे की हमारा बचपन केसा होता होगा तो वह आपको आपकि दोस्ती की  बारखड़ी 'आ' से लेकर 'ज्ञा' तक बता देंगे तब आपको कुछ समझ में आएगा!


जबकि हमारी  सबसे पहली  दोस्ती तो हमारे अपने , सगे सम्बन्धी और परिवार के लोगो  से ही होती है! फिर क्यों लोग इन्हे भूलने लगते है और नए दोस्त बनाते है , जबकि यही हमारे सबसे पहले दोस्त और बेस्ट फ्रेंड होते है!


आप आज के समय की  दोस्ती को इतना मानते हो न उससे  कही लाख गुना तो हमारे परिवार वाले दोस्ती मानते है जिसका आपको पता ही नहीं होता है!






दोस्तों  इस लेख से यही सन्देश देना चाहता हूँ युवा पीड़ी को या मेरी हमउम्र के दोस्तों को ,  की दोस्ती करे लेकिन उतनी ही  करे जितनी आटे में नमक समाये मेरा कहने का मतलब यह है की आप दोस्ती करे लेकिन अपनी दोस्ती को इतना गहरा न बनाये , जिससे आपको अपने पहले  दोस्त  मतलब अपने परिवार को भूलना न पडे!


क्योंकि आज के समय वाली दोस्ती में कुछ नहीं रखा है , न ही प्यार , न ही विश्वास बस रखा है तो वो है  सिर्फ मतलब.............. अब यहाँ इसका मतलब क्या है आपके लिए इसका अर्थ है स्वार्थ जिसे लोग सेल्फिश या स्वार्थी भी कहते है!

दोस्तों दोस्ती तो में भी करता हूँ , और बहुत सारे दोस्त भी , और जीवन में दोस्त बनाना बहुत जरूरी है क्यूंकि दोस्त के वगैर ज़िंदगी अधूरी है


लेकिन क्या हम दोस्ती करते वक्त यह नहीं जान सकते है की जिससे हम दोस्ती कर रहे है वो सही है गलत , यह तो जान ही सकते है न , तो दोस्तों आप दोस्ती करो दिल से लेकिन जो आप दोस्त बना रहे हो उसको जानो पहचानो और समझो क्यूंकि आज का दौर नहीं है दोस्ती करने का बस स्वार्थी दोस्ती है इसलिए अपने आप की संभालों और पहचानो की आखिर दोस्ती का सही मतलब क्या है!


एक दोस्ती वो जो हमारे जीवन से ही हमारी दोस्ती निभा रहे है मतलब हमारे परिवार के सदस्य!



दूसरी दोस्ती यह जब हम कुछ सोचने और समझने लग जाते है तब बनने वाली दोस्ती या इसके बाद वाली दोस्ती!
अब फैसला आपके हाथ में है आपको परिवार वाली दोस्ती चाहिए या आपने स्वयं बनाई वो वाली!


में तो अपने परिवार के साथ वाली दोस्ती निभाना चाहूंगा  क्यूंकि यही हमारी पहली दोस्ती है और जो पहली दोस्ती होती है वही हमारी जीवन की दोस्ती होती है!



दोस्त यह विचार मुझे तब आया जब मेने अपनी मम्मी से सवाल किया  की मेरा बचपन केसा था तो उन्होने उसका बहुत ही मार्मिक चित्रण किया और बताया! तब मुझे पता चला की दोस्ती की असली पहचान तोह हमारे अपने होते है!



दोस्तों अब यह लेख यही ख़त्म होता है 'दोस्ती की पहचान' आपको मेरा यह लेख केसा लगा जरूर बताये ताकि मेरा मनोबल बढे और में अच्छा प्रयास करूं लिखने का .....धन्यवाद...सोनू मेवाडे


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