क्या हमारा देश वाकय में आजाद है , आइये जानते है?







दोस्तों आपके के हिंदी विचार ब्लॉग में  आप सभी का स्वागत है और  साथ ही स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाये एवं बधाई  देता हूँ!

 दोस्तों आज देश को आजाद हुए 71 साल हो गए लेकिन आजादी के जिन मायनों के सपने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों ने देखे थे वो आज भी अधूरे हैं।

देश की करीब आधी आबादी आज भी रोटी, कपड़ा, मकान, साफ पानी, शौचालय, शुद्ध हवा, बुनियादी शिक्षा और बुनियादी स्वास्थ्य सेवा के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।

भारत रोजगार 2016 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल 11 करोड़ 70 लाख बेरोजगार थे। 26 नवंबर, 1949 को जब देश ने संविधान लागू किया था, तब यह घोषणा की थी कि हम संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में रहकर देश के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय दिलाएंगे।




उन्हें अवसर की समानता उपलब्ध कराएंगे, राष्ट्रीय एकता और अखंडता सुनिश्चित कराएंगे, गैरबराबरी वाला समतामूलक समाज की स्थापना करेंगे मगर करीब सात दशक बाद भी संविधान की यह आत्मा कागजों पर ही अंकित रह गई है और असल में सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक न्याय की भावना गुम हो चुकी है।

आज भी देश इन समस्याओं से आजादी की बाट जोह रहा है-

भय, भूख, भ्रष्‍टाचार – स्वाधीनता के सात दशक बाद भी हम भय के साए में जीने को विवश हैं। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के साथ अपराध की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक बलात्कार के मामले साल 2015 की तुलना में 2016 में 12.4% बढ़े हैं। 2016 में 38,947 बलात्कार के मामले देश मे दर्ज हुए थे।




साल 2018 तक इस आंकड़े के और बढ़ने की आशंका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नोटबंदी के बाद से साइबर क्राइम में काफी तेजी आई है।

साल 2014 में साइबर क्राइम के कुल 9,622 मामले दर्ज किए गए जो बढ़कर 2015 में 11 हजार 592 तक पहुंच गया। साल 2016 में साइबर क्राइम का आंकड़ा 12 हजार 317 तक पहुंच चुका है।

हम भले ही खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड बनाकर अपनी पीठ थप-थपा लेते हैं, मगर आज भी भूख और कुपोषण से मौतों की खबर आना और सरकारी मशीनरी का उसे छुपाने की जुगत में लगना ऐसी उपलब्‍ध‍ियों पर काल‍िख पोत देता है।




बेतुके कानूनों की जंजीर और कई अच्‍छे कानून का दुरुपयोग – देश में बेतुके कानूनों की भरमार है जो ब्रिटिश काल में बनाए गए थे। इनमें से कुछ कानूनों को केंद्र सरकार ने खत्म किया है।

पिछले साल ही केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ऐसे बेतुके पुराने 1824 कानूनों को चिन्हित करने की बात कही थी।

मोदी सरकार ने अबतक ऐसे ही कुल 1200 कानून खत्म किए हैं जबकि पूर्ववर्ती सरकारों ने भी लगभग 1300 कानून खत्म किए हैं।

हाल ही में मोटर व्हीकल एक्ट संशोधन हुआ है। पुराने इंडियन मोटर व्हीकल एक्ट 1914 की बानगी देखिए- उस कानून के तहत आंध्र प्रदेश में एक इंस्पेक्टर के दांत बिल्कुल दूध की तरह चमकते होने चाहिए थे लेकिन उसकी छाती सिकुड़ी हुई, घुटने सटे हुए और पंजे हथौड़े की तरह हुए तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता था।




जहां ऐसे बेतुके कानूनों से आजादी की जरूरत है, वहीं कुछ अच्‍छे कानूनों के दुरुपयोग से मुक्‍त‍ि द‍िलाना भी चुनौती बन गया है।

देश में कई कानून खास इसी मकसद से बनाए गए क‍ि मह‍िलाओं, अनुसूच‍ित जात‍ि/जनजात‍ि और दल‍ितों के ल‍िए सुरक्षा का पुख्‍ता इंतजाम क‍िया जाए। पर इन कानूनों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है।

दहेज व‍िरोधी कानून, घरेलू हिंसा कानून, एससी-एसटी एक्‍ट आद‍ि कई कानूनों का दुरुपयोग धड़ल्‍ले से हो रहा है। यह हमें कानूनी व‍िसंगत‍ियों की जंजीरों से मुक्‍त नहीं होने दे रहा और न्‍याय व्‍यवस्‍था में लोगों का भरोसा ड‍िगा रहा है।




आरक्षण का राजनीतिक इस्‍तेमाल –संविधान का अनुच्छेद 15(4) सरकार को यह इजाजत देता है कि सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक रूप से पिछड़े या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए विशेष प्रावधान किया जा सकता है।

इसी के तहत राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जाति और जनजाति को लोगों को 10 सालों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए थे लेकिन हर 10 साल के बाद संविधान संशोधन के जरिए इन्हें बढ़ा दिया जाता है।

1953 में काका कालेलकर समिति की सिफारिश पर एससी-एसटी समुदाय को नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण दिया गया। बाद में 1990 में मंडल आयोग की सिफारिश पर वीपी सिंह ने ओबीसी समुदाय को आरक्षण लागू किया लेकिन बाद में चलकर यह सियासी मसला बन गया।

राजनीतिक पार्टियों ने जातीय आधारित आरक्षण व्यवस्था को दलगत राजनीतिक वोट बैंक समझ लिया।




हिंदू-मुसलमान का भेद – 1947 में जब देश आजाद हुआ तब भारत-पाक विभाजन के बाद देश दंगों की आग में झुलस उठा लेकिन 71 साल बाद आज भी देश हिन्दू-मुसलमान के भेद से उबर नहीं सका है। दोनों ही तरफ से ध्रुवीकरण की कोशिशें जारी हैं और जारी हैं इनके सियासी लाभ उठाने का सिलसिला।

हाल ही में असम में एनआरसी के मामले को भी हिन्दू-मुस्लिम का रंग दिया गया। देश के कई हिस्सों में हर साल कई धार्मिक मौकों पर साम्प्रदायिकता का जहर असर दिखाता रहता है।

हालांकि, एनसीआरबी के आंकड़े कहते हैं कि साल 2015 की तुलना में 2016 में दंगों की संख्या में 5 प्रतिशत की कमी आई है मगर मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक हालात के मद्देनजर दोनों समुदायों में दूरी बढ़ी है।

नाकाबिल जनप्रतिनिधियों को झेलने की मजबूरी – 68 साल के गणतांत्रिक इतिहास में भारतीय संसद और राज्यों की विधानसभाएं नाकाबिल और अपराधी किस्म के जनप्रतिनिधियों को झेलती रही है।

भारत में दुनिया का सबसे मजबूत लोकतंत्र माना जाता है मगर आज भी संसद में दागियों की भरमार है। एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में लोकसभा में चुन कर आए 542 सांसदों में से 185 यानी 34 फीसदी सांसदों के नाम आपराधिक मुकदमा दर्ज है ।

इसी रिपोर्ट के मुताबिक 185 में से 112 सांसदों पर तो गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। अभी तक ऐसी व्‍यवस्‍था का इंतजार ही है ज‍िसके तहत अगर चुना हुआ जनप्रत‍िन‍िध‍ि काम न कर रहा हो तो उसे हटा कर पांच साल से पहले दूसरा जनप्रत‍िन‍िध‍ि चुना जाए।




वोट बैंक की राजनीति – सभी राजनीतिक दल जन कल्याण की बातें करते हैं मगर असलियत में वोट बैंक की राजनीति करते हैं।

तीन तलाक, एससी-एसटी एक्ट में संशोधन, ओबीसी बिल या महिला आरक्षण बिल कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो राजनीतिक दलों ने अपने-अपने समय पर अपने-अपने वोट बैंक की राजनीति के लिहाज से गढ़े हैं और उसे पास कराने या नहीं कराने पर राजनीति की है। सर्वसमाज के जन कल्याण की भावना राजनीतिक दलों के लिए अभी भी दूर की कौड़ी है।

महंगा इलाज, महंगी पढ़ाई – भारत में स्वास्थ्य सेवा बड़ी लचर हालत में है। यहां बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका से भी बदतर स्थिति है।

अमेरिकी हेल्थ जर्नल ‘लैंसेट’ के अध्ययन के अनुसार, भारत 195 देशों की सूची में भारत अपने पड़ोसी देश चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से पीछे रहकर 145वें पायदान पर है। भारत में इलाज भी बहुत महंगा है।

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक महंगे इलाज के चक्कर में गंभीर बीमारी के शिकार 32% लोग हर साल गरीबी रेखा के नीचे पहुंच जाते हैं। इसी साल सुप्रीम कोर्ट भी महंगे इलाज पर चिंता जता चुका है। शिक्षा भी बहुत महंगी है और धीरे-धीरे निजी हाथों में जा रही है।




सरकारी विश्वविद्यालयों में सालों से शिक्षक नहीं हैं जबकि निजी विश्वविद्यालय मोटी फीस वसूलकर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं। अभी हाल ही में उत्तराखंड में मेडिकल शिक्षा की फीस 300 गुना बढ़ा दी गई थी। पांच लाख रुपये की ट्यूशन फीस बढ़ाकर 19.76 लाख कर दी गई थी।

मैं, मेरा वाली भावना – देश के हु्क्मरान हों या जन प्रतिनिधि या फिर आम नागरिक। सभी ‘मैं’ की परिधि से बाहर नहीं निकल सके हैं। सभी आत्मकेंद्रित होकर अपने विकास की बात सोचते हैं जबकि राष्ट्र निर्माण वसुधैव कुटुम्बकम से ही संभव है।

जब सभी लोग जातीय, क्षेत्रीय या धार्मिक किलेबंदी से बाहर निकलेंगे, तभी आजादी के मायने साकार हो सकेंगे।

सोच कि सरकारी माल मतलब बेदर्दी से इस्‍तेमाल – देश में आज भी सरकारी संसाधनों के बेजा इस्तेमाल हो रहा है। लोग सरकारी चीजों का बेदर्दी से इस्तेमाल ही नहीं दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकारी बसें, रेल में लोग बिना टिकट के सफर करते हैं।

सरकारी दफ्तरों में लोग बिना सोचे समझे बिजली के उपकरणों, गाड़ियों, सिस्टम या अन्य सामानों का अंधाधुंध दुरुपयोग करते हैं। इनका दुरुपयोग देश पर आर्थिक बोझ बढ़ाता है।

व‍िरोध के नाम पर जहां जनता ही सार्वजन‍िक संपत्‍त‍ि बर्बाद कर देती है, वहीं शासन-प्रशासन के नाम पर नेता शाहखर्ची में जुटे हैं।




जल, जंगल, जमीन, जीवन की बर्बादी गांवों की अनदेखी – विकास के नाम पर बेतहाशा जंगलों की कटाई हुई। जमीन अधिग्रहण किए गए। जल स्रोत का दुरुपयोग हुआ। प्राकृतिक संसाधनों का बेजा इस्तेमाल किया गया और इस पूरी प्रक्रिया में गांवों की अनदेखी की गई।

नतीजतन न सिर्फ पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ा बल्कि गांव के गांव खाली हो गए और शहरों में अचानक भीड़ जमा हो गई। व‍िकास एक सीम‍ित इलाकों तक सि‍मट कर रह गई है। यह हमें प्रदूषण और संसाधनों की कमी के जंजाल में लगातार जकड़ रहा है।

बेतरतीब विकास के नाम पर बढ़ते शहर और वहां बढ़ती भीड़ – आज देश की करीब 34 फीसदी आबादी शहरों में निवास करती है।

साल 2011 से यह 3 फीसदी बढ़ी है। 1901 में शहरी आबादी मात्र 11 फीसदी थी। आजादी के बाद शहरीकरण और शहरी आबादी में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है।




आजादी के वक्त देश में चार बड़े शहर थे जो महागनर कहलाते थे लेकिन मौजूदा दौर में 15 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों की संख्या 25 हो गई है। शहरी चकाचौंध और ग्रामीण इलाकों में बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने शहरों में भीड़ बढ़ा दी है।

यह भीड़ यहां काल बनकर आई हैं, जहां इस तरह की संक्रेंद्रित आबादी के लिए मूलभूत सुविधाओं का भी संकट है।






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